मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011
रविवार, 5 दिसंबर 2010
ढाई आखर प्रेम कहानी
मुस्कानों को तन पे लपेटे
हम फिरते हैं तनहा तनहा.
दर्द का तन दिख पाए कैसे?
बड़ी बड़ी तुम बातें करते
रिश्ते -नाते, कसमे -वादें
ढाई आखर प्रेम कहानी
हम तुमको समझाएं कैसे?
हम फिरते हैं तनहा तनहा.
दर्द का तन दिख पाए कैसे?
बड़ी बड़ी तुम बातें करते
रिश्ते -नाते, कसमे -वादें
ढाई आखर प्रेम कहानी
हम तुमको समझाएं कैसे?
रविवार, 14 नवंबर 2010
दिन को चाँद रातों को सूरज ढूंढता हूँ.
कैसे कैसे ख्वाब लिए मैं इन सड़कों पे घूमता हूँ.
ज़मी पे कदम हैं मगर आसमां को चूमता हूँ .
कितना भी दुस्वार क्यूँ न हो काम वही करता हूँ.
दिन को चाँद रातों को सूरज ढूंढता हूँ.
नाकामयाब होता हूँ , लेकिन नाउमीद नहीं.
मेरे दिल में एक खुदा है, हर ठोकर पे उसे पूजता हूँ.
ज़िन्दगी से खफा हो के जाएँ कहाँ
कभी राजी , तो कभी इसी से रूठता हूँ.
ज़िन्दगी के कुछ प्याले ज़हर थे , अमृत समझ के पी गया।
अब न जीता हूँ , न मैं मारता हूँ.
ज़मी पे कदम हैं मगर आसमां को चूमता हूँ .
कितना भी दुस्वार क्यूँ न हो काम वही करता हूँ.
दिन को चाँद रातों को सूरज ढूंढता हूँ.
नाकामयाब होता हूँ , लेकिन नाउमीद नहीं.
मेरे दिल में एक खुदा है, हर ठोकर पे उसे पूजता हूँ.
ज़िन्दगी से खफा हो के जाएँ कहाँ
कभी राजी , तो कभी इसी से रूठता हूँ.
ज़िन्दगी के कुछ प्याले ज़हर थे , अमृत समझ के पी गया।
अब न जीता हूँ , न मैं मारता हूँ.
मंगलवार, 9 नवंबर 2010
सोमवार, 8 नवंबर 2010
रविवार, 7 नवंबर 2010
इस दिवाली पर बड़ा मजा आया
इस दिवाली पर बड़ा मजा आयामैं पठाखे नहीं , एक सुंदर सी कलम ले आया था ।
दिए नहीं एक प्यारी सी डायरी ले आया था ।
कहीं नहीं गया, न कोई मिठाई लाया था।
दुनिया के सारे दरवाज़े बंद किये।
ब्लॉग बंद , इमेल बंद, मोबाइल बंद, कमरा बंद ।
खुला रखा तो सिर्फ एक दरवाज़ा , दिल का दरवाज़ा।
अँधेरे बंद कमरे में बैठा ।
डायरी का पहला पन्ना खोला ।
लिखा- रोशनी ...
जग मग रोशनी से सारा कमरा जगमगा उठा ।
टिमटिमाते दिए कमरे में इतराने लगे।
फिर लिखा - मिठाई
मुह मिठास से भर आया ।
पकवान मन को लुभाने लगे।
मेरी नजरो ने दरवाजों को इशारा किया
दरवाज़े खुले , तुम आये , वो आये, सब आये ।
खुशियों का आलम आया।
सबको विदा किया , दरवाज़ा फिर बंद।
मैं बाहर से सो गया, अन्दर से जाग गया ।
रूह रोशन हुयी , प्रेम का रास हुआ ।
राम की विजय हुयी , रावण को वनवास हुआ ।
जब कमरे से बाहर आया , मैं वो नहीं था, मैं बिलकुल नया ।
उस कमरे में मैं अपना दिल जला आया था।
अब की दिवाली पे बड़ा मजा आया था।
शनिवार, 30 अक्टूबर 2010
सब देख रहा हूँ
जो जैसा कर रहा है सब देख रहा हूँ।
किसकी नज़र में क्या है सब देख रहा हूँ।
वो हंस के बोलते हैं, ज़हर भी घोलते हैं।
उनके इरादे क्या हैं सब देख रहा हूँ।
पलकों पे कहीं ख्वाब सजते देख रहा हूँ।
आँखों में उमड़ते आंसू सब देख रहा हूँ।
बहती नदी की धार ,कहीं देख रहा हूँ ।
संजीदगी समंदर की सब देख रहा हूँ।
तेरी नज़र में क्या है , उसकी नज़र में क्या है।
मेरी नज़र में क्या , सब देख रहा हूँ।
किसकी नज़र में क्या है सब देख रहा हूँ।
वो हंस के बोलते हैं, ज़हर भी घोलते हैं।
उनके इरादे क्या हैं सब देख रहा हूँ।
पलकों पे कहीं ख्वाब सजते देख रहा हूँ।
आँखों में उमड़ते आंसू सब देख रहा हूँ।
बहती नदी की धार ,कहीं देख रहा हूँ ।
संजीदगी समंदर की सब देख रहा हूँ।
तेरी नज़र में क्या है , उसकी नज़र में क्या है।
मेरी नज़र में क्या , सब देख रहा हूँ।
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