शनिवार, 21 अगस्त 2010

मौलाना रूमी

कभी कहीं पढ़ा था , याद नहीं कहाँ , मौलाना रूमी की एक किताब हाथ लगी थी , हाँ याद आया , किताब का नाम था, मौलाना रूमी और सूफी फकीरों की कहानिया। किताब के पहले पन्ने पे लिखा था , हम उस खुदा का सजदा करते हैं , जिसने दुनिया वालों के खुदा को बनाया है। उनके वक़्त के तमाम सूफी फकीरों की दास्तान थी उन् में। पढ़ कर बहुत सिखने को मिला और ताजुब भी हुआ की कैसे कैसे लोग इस दुनिया में आये हैं। उस्सी किताब में रजब नाम से मशहूर एक फकीर का किसा पढ़ा , उनके गुरु का नाम भूल गया , लिखा था, रज़ब के गुरु सूफी फकीर थे और वो जहाँ भी जाते थे, माएं अपने जवान बच्चों को घर में छुपा लेती थी। उनकी आँखों में एक ऐसी कशिश थी की जिससे भी टकरा जाएँ वो उनका दीवाना हो जाता था। उनकी रूहानियत भरी आँखें उससे खींच लेती थी। और बंद दुनिया से नायार हो जाता था। एक बार वो रज़ब के गाँव से गुज़रे। रज़ब शेहरा सजाये घोड़ी पे बैठे , गाजे बाजे के साथ अपनी बारात लिए जा रहे थे। कहते हैं रज़ब को एक लड़की से मोहबत थी , लेकिन दोनों के खानदान में जाती दुश्मनी सदियों से चलती आ रही थी। बहुत कोशिशों और के बाद आखिर मोहबत की जीत हुयी और दोनों खानदानों ने दुश्मनी भुला कर उन्हें निकाह की इज्ज़ाज़त दे दी। आज उनकी मुराद पूरी होने वाली थी। आज प्यार उनका मंजिल पाने जा रहा था। लेकिन होना तो कुछ और ही था। रज़ब के गुरु अचानक आ गए । सब ने आँखें पलट ली की कहैं ये दीवाना फकीर उन्हें देख न ले। लेकिन रज़ब ने शेहरा हटा के देख ही लिया । नज़रे नज़रों से मिली और रज़ब देखता ही रह गया। मस्त फकीर ने कहा। "रज़ब कियो गज़ब , सर पे बंधा मौरआया था हरी भजन को , चला नरक की ठौर " बस इतना ही कहा। और रज़ब उनके पीछे हो लिया। बाप भाई , यार दोस्त समझाते रह गए । उन्होंने एक न सुनी। माशूका के संदेशे , उसके आंसू भी उन्हें रोक नहीं पाए। कहते हैं रज़ब के गुरु ने जब चोला छोड़ दिया और इस दुनिया से कूंच कर गए। रज़ब ने आँखें बंद कर ली। और मरते दम तक नहीं खोली। कहते थे, जिनको देखता था अब वो दुनिया में नहीं है। खुली आँखों से वो दीखता नहीं। बंद आँखों से दीखता है।

मौलाना रूमी की भी एक रुबाई थी जिस में लैला और मजनू का जिक्र था । अब यहाँ सवाल उठता है , लैला मजनू का किस्सा पुराना है या रूमी साहब का? खैर इतिहास में झाँक कर देखा नहीं। वैसे रुबाई बड़ी दिलचस्प है। लिखा है। एक खुमकड़ विद्वान लैला मजनू के प्रेम की कहानिया सुन कर लैला के पास आया। की आखिर लैला क्या बाला है, जो कैश (मजनू ) जैसा सुन्दर बांका जवान लैला पे कुर्बान है। आखिर ये हसीना है कौन? लेकिन जब लैला को देखा तोह , दंग रहा गया। कहते हैं, लैला बहुत खूबसूरत नहीं थी। वो लैला से बोला ।

कैश (मजनू ) को तुने कैसे परेशां किया , तू हसीनो में कोई अफजूं नहीं

लैला बोली
खामोश तू मजनू नहीं

लिखा है लैला को देखने के लिए मजनू की आँखें चाहिए ।

रि मा इ न ड मी लेटर

जैसे ही कंप्यूटर खोला

मेसेज का बॉक्स खुला , मेसेज था

सॉफ्टवेर अपडेट करें , आपके ब्रॉडबैंड इन्टरनेट पे बस कुछ मिनट में हो जायेगा , कंप्यूटर रिस्टार्ट करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी

कुछ सोचा , याद आया , इन्टरनेट में बैलेंस नहीं है ..

फिर देखा , लिखा था , इन्स्टाल ना एंड रि मा मी लेटर

दो आप्शन थे , रि मा मी लेटर पे क्लिक कर दिया

बॉक्स बंद हो गया , ऐसा लगा , समस्या का समाधान हो गया .

अगर आप परेशानी में हो और आपको आप्शन मिल जाए ,

तो बड़ा रेलिएफ मिलता है . कुछ वक़्त के लिए ही सही ,

आदमी की आदत है , कल किसी उम्मीद में जी लेता है .

तभी बच्चा गया , बोला कंप्यूटर टीयु अन की फीस भरनी है

कुछ सोचा , याद आया , बैंक में बैलेंस नहीं है .

फिर उसे देखा , कंप्यूटर की तरह उसकी आँखों में लिखा था .

अभी या कल याद दिलायुं .

दो आप्शन उसकी दोनों आँखों में इन्स्टाल ना और रि मा इ न ड मी लेटर की तरह बने बॉक्स साफ़ दिख रहे थे .

दिमाग जैसे सुन्न था , मूह से निकला , रि मा इ न ड मी लेटर।

वो चला गया , वैसे ही जैसे क्लिक करते ही कंप्यूटर में मेसेज बॉक्स बंद हो गया था

लेकिन मेरे दिमाग में गूंजता रहा , रि मा इ न ड मी लेटर।

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

सत्य

जीवन निर्वाद सत्य है , सपना नहीं ।
कहने को सब अपने हैं, कोई अपना नहीं।
मैंने लिख दिए जो मेरे ज़ज्बात हैं।
कोई रचना नहीं।

लब्ज़ अच्छे हैं, तुकबंदी अच्छी है।
सबके लिए यही कविता है।
शब्दों के बीच क्या है?
कोई समझता नहीं।