शनिवार, 21 अगस्त 2010
मौलाना रूमी
मौलाना रूमी की भी एक रुबाई थी जिस में लैला और मजनू का जिक्र था । अब यहाँ सवाल उठता है , लैला मजनू का किस्सा पुराना है या रूमी साहब का? खैर इतिहास में झाँक कर देखा नहीं। वैसे रुबाई बड़ी दिलचस्प है। लिखा है। एक खुमकड़ विद्वान लैला मजनू के प्रेम की कहानिया सुन कर लैला के पास आया। की आखिर लैला क्या बाला है, जो कैश (मजनू ) जैसा सुन्दर बांका जवान लैला पे कुर्बान है। आखिर ये हसीना है कौन? लेकिन जब लैला को देखा तोह , दंग रहा गया। कहते हैं, लैला बहुत खूबसूरत नहीं थी। वो लैला से बोला ।
कैश (मजनू ) को तुने कैसे परेशां किया , तू हसीनो में कोई अफजूं नहीं।
लैला बोली
खामोश तू मजनू नहीं ।
लिखा है लैला को देखने के लिए मजनू की आँखें चाहिए ।
रि मा इ न ड मी लेटर
जैसे ही कंप्यूटर खोला
मेसेज का बॉक्स खुला , मेसेज था
सॉफ्टवेर अपडेट करें , आपके ब्रॉडबैंड इन्टरनेट पे बस कुछ मिनट में हो जायेगा , कंप्यूटर रिस्टार्ट करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी ।
कुछ सोचा , याद आया , इन्टरनेट में बैलेंस नहीं है ..
फिर देखा , लिखा था , इन्स्टाल नाउ एंड रि मा इ न ड मी लेटर
दो आप्शन थे , रि मा इ न ड मी लेटर पे क्लिक कर दिया ।
बॉक्स बंद हो गया , ऐसा लगा , समस्या का समाधान हो गया .
अगर आप परेशानी में हो और आपको आप्शन मिल जाए ,
तो बड़ा रेलिएफ मिलता है . कुछ वक़्त के लिए ही सही ,
आदमी की आदत है , कल किसी उम्मीद में जी लेता है .
तभी बच्चा आ गया , बोला कंप्यूटर टीयु श अन की फीस भरनी है ।
कुछ सोचा , याद आया , बैंक में बैलेंस नहीं है .
फिर उसे देखा , कंप्यूटर की तरह उसकी आँखों में लिखा था .
अभी या कल याद दिलायुं .
दो आप्शन उसकी दोनों आँखों में इन्स्टाल नाउ और रि मा इ न ड मी लेटर की तरह बने बॉक्स साफ़ दिख रहे थे .
दिमाग जैसे सुन्न था , मूह से निकला , रि मा इ न ड मी लेटर।
वो चला गया , वैसे ही जैसे क्लिक करते ही कंप्यूटर में मेसेज बॉक्स बंद हो गया था ।
लेकिन मेरे दिमाग में गूंजता रहा , रि मा इ न ड मी लेटर।
मंगलवार, 3 अगस्त 2010
सत्य
कहने को सब अपने हैं, कोई अपना नहीं।
मैंने लिख दिए जो मेरे ज़ज्बात हैं।
कोई रचना नहीं।
लब्ज़ अच्छे हैं, तुकबंदी अच्छी है।
सबके लिए यही कविता है।
शब्दों के बीच क्या है?
कोई समझता नहीं।