रविवार, 11 सितंबर 2011

मेरे फ्लैट की खिड़की से सागर दिखता है


मेरे फ्लैट की खिड़की से सागर दिखता है॥
धरती से मिलता ये अम्बर दिखता है॥
टीम टीम करते आते हैं चंदा -तारे
झिलमिल झीलमिल सारा शहर दिखता है।
सच बादल में बनता है क्या रूप तुम्हारा
या ये मौसम का असर दिखता है।
रिम झिम बादल जैसा मेरा मन
सपनो का नम सारा मंजर दिखता है।
भरा पड़ा है घर मेरा दुनिया के सामान से
तुम बिन लेकिन सबकुछ मुझको कम दिखता है.
लाखो सुरज हो जाएँ शर्मिंदा जैसे
जब मुझको मेरा अंतर दिखता है .