रविवार, 14 नवंबर 2010

दिन को चाँद रातों को सूरज ढूंढता हूँ.

कैसे कैसे ख्वाब लिए मैं इन सड़कों पे घूमता हूँ.
ज़मी पे कदम हैं मगर आसमां को चूमता हूँ .

कितना भी दुस्वार क्यूँ न हो काम वही करता हूँ.
दिन को चाँद रातों को सूरज ढूंढता हूँ.

नाकामयाब होता हूँ , लेकिन नाउमीद नहीं.
मेरे दिल में एक खुदा है, हर ठोकर पे उसे पूजता हूँ.

ज़िन्दगी से खफा हो के जाएँ कहाँ
कभी राजी , तो कभी इसी से रूठता हूँ.

ज़िन्दगी के कुछ प्याले ज़हर थे , अमृत समझ के पी गया।
अब न जीता हूँ , न मैं मारता हूँ.

रविवार, 7 नवंबर 2010

इस दिवाली पर बड़ा मजा आया

इस दिवाली पर बड़ा मजा आया
मैं पठाखे नहीं , एक सुंदर सी कलम ले आया था
दिए नहीं एक प्यारी सी डायरी ले आया था
कहीं नहीं गया, कोई मिठाई लाया था
दुनिया के सारे दरवाज़े बंद किये
ब्लॉग बंद , इमेल बंद, मोबाइल बंद, कमरा बंद
खुला रखा तो सिर्फ एक दरवाज़ा , दिल का दरवाज़ा
अँधेरे बंद कमरे में बैठा
डायरी का पहला पन्ना खोला
लिखा- रोशनी ...
जग मग रोशनी से सारा कमरा जगमगा उठा
टिमटिमाते दिए कमरे में इतराने लगे
फिर लिखा - मिठाई
मुह मिठास से भर आया
पकवान मन को लुभाने लगे
मेरी नजरो ने दरवाजों को इशारा किया
दरवाज़े खुले , तुम आये , वो आये, सब आये
खुशियों का आलम आया
सबको विदा किया , दरवाज़ा फिर बंद
मैं बाहर से सो गया, अन्दर से जाग गया
रूह रोशन हुयी , प्रेम का रास हुआ
राम की विजय हुयी , रावण को वनवास हुआ
जब कमरे से बाहर आया , मैं वो नहीं था, मैं बिलकुल नया
उस कमरे में मैं अपना दिल जला आया था
अब की दिवाली पे बड़ा मजा आया था