रविवार, 7 नवंबर 2010

इस दिवाली पर बड़ा मजा आया

इस दिवाली पर बड़ा मजा आया
मैं पठाखे नहीं , एक सुंदर सी कलम ले आया था
दिए नहीं एक प्यारी सी डायरी ले आया था
कहीं नहीं गया, कोई मिठाई लाया था
दुनिया के सारे दरवाज़े बंद किये
ब्लॉग बंद , इमेल बंद, मोबाइल बंद, कमरा बंद
खुला रखा तो सिर्फ एक दरवाज़ा , दिल का दरवाज़ा
अँधेरे बंद कमरे में बैठा
डायरी का पहला पन्ना खोला
लिखा- रोशनी ...
जग मग रोशनी से सारा कमरा जगमगा उठा
टिमटिमाते दिए कमरे में इतराने लगे
फिर लिखा - मिठाई
मुह मिठास से भर आया
पकवान मन को लुभाने लगे
मेरी नजरो ने दरवाजों को इशारा किया
दरवाज़े खुले , तुम आये , वो आये, सब आये
खुशियों का आलम आया
सबको विदा किया , दरवाज़ा फिर बंद
मैं बाहर से सो गया, अन्दर से जाग गया
रूह रोशन हुयी , प्रेम का रास हुआ
राम की विजय हुयी , रावण को वनवास हुआ
जब कमरे से बाहर आया , मैं वो नहीं था, मैं बिलकुल नया
उस कमरे में मैं अपना दिल जला आया था
अब की दिवाली पे बड़ा मजा आया था

5 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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  2. दिलजलों की दीवाली भी अलग, अंदाज भी अलहदा।
    बहुत खूबसूरत लिखा है आनंद जी। बधाई एवम शुभकामनायें, खुद को खोजने की तलाश मुकम्मल हो आपकी।

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  3. मैं बाहर से सो गया.... अंदर से जाग गया..... सच में दिवाली तो यही होती है....
    बहुत अर्थपूर्ण

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  4. mujh me itni samajh nahi ki apki rachnaon ke liye kuchh kahu. bas yahi kahungi ki padh kar achha lagta hai.

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