रविवार, 14 नवंबर 2010

दिन को चाँद रातों को सूरज ढूंढता हूँ.

कैसे कैसे ख्वाब लिए मैं इन सड़कों पे घूमता हूँ.
ज़मी पे कदम हैं मगर आसमां को चूमता हूँ .

कितना भी दुस्वार क्यूँ न हो काम वही करता हूँ.
दिन को चाँद रातों को सूरज ढूंढता हूँ.

नाकामयाब होता हूँ , लेकिन नाउमीद नहीं.
मेरे दिल में एक खुदा है, हर ठोकर पे उसे पूजता हूँ.

ज़िन्दगी से खफा हो के जाएँ कहाँ
कभी राजी , तो कभी इसी से रूठता हूँ.

ज़िन्दगी के कुछ प्याले ज़हर थे , अमृत समझ के पी गया।
अब न जीता हूँ , न मैं मारता हूँ.

11 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ...सकारात्मकता और उर्जा बिखेरती बहुत ही सुन्दर रचना...



    अंतिम शेर को थोडा सा और संवार लें तो क्या बात होगी...बाकी सभी शेर लाजवाब हैं...

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  2. तीसरा शेर सबसे ज्यादा पसंद आया...... बेहतरीन

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  3. वाह आनंद जी, इसी खूबसूरत जज़्बे के तो हम कायल है। दिन को चाँद और रात में सूरज को ढूंढना, नाकामयाब लेकिन नाउम्मीद नहीं, बहुत अच्छी रचना है अपकी

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  4. एक उम्दा ग़ज़ल के लिए बधाई।

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