रविवार, 5 दिसंबर 2010

ढाई आखर प्रेम कहानी

मुस्कानों को तन पे लपेटे
हम फिरते हैं तनहा तनहा.
दर्द का तन दिख पाए कैसे?
बड़ी बड़ी तुम बातें करते
रिश्ते -नाते, कसमे -वादें
ढाई आखर प्रेम कहानी
हम तुमको समझाएं कैसे?

14 टिप्‍पणियां:

  1. बस यही समझाना तो मुश्किल है..... सुंदर भाव हैं.....

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  2. इन ढाई अक्षरो को समझने समझाने मे जिन्दगी कम लगने लगती है।
    सुन्दर कविता

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  3. बहुत सुन्दर रचना ..
    दिल को छू गयी ...बधाई

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  4. ये ढाई आखर ही जो पढ़-समझ जाये, उससे बड़ा विद्वान और कौन होगा? लेकिन जिसे समझना है, वो समझ ही लेता है, यकीन करना दोस्त, अगर कर सको इस बात पर।

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  5. ये समझाना नहीं समझ में आना होता है.

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  6. tabhi to kahte hain..hum tum ko samjhayen kaise? sab aapki tarah samajhdar kahan hote hain..

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  7. क्रिसमस की शांति उल्लास और मेलप्रेम के
    आशीषमय उजास से
    आलोकित हो जीवन की हर दिशा
    क्रिसमस के आनंद से सुवासित हो
    जीवन का हर पथ.

    आपको सपरिवार क्रिसमस की ढेरों शुभ कामनाएं

    सादर
    डोरोथी

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  8. दिल की गहराईयों को छूने वाली एक खूबसूरत प्रस्तुति. आभार.

    अनगिन आशीषों के आलोकवृ्त में
    तय हो सफ़र इस नए बरस का
    प्रभु के अनुग्रह के परिमल से
    सुवासित हो हर पल जीवन का
    मंगलमय कल्याणकारी नव वर्ष
    करे आशीष वृ्ष्टि सुख समृद्धि
    शांति उल्लास की
    आप पर और आपके प्रियजनो पर.

    आप को सपरिवार नव वर्ष २०११ की ढेरों शुभकामनाएं.
    सादर,
    डोरोथी.

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  9. इस ढाई अक्षर में बहुत कुछ निहित है - अच्छे भाव

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  10. रिश्ते -नाते, कसमे -वादें
    ढाई आखर प्रेम कहानी
    हम तुमको समझाएं कैसे?

    sahi baat
    ye dhaayi aakhar hi log samajh len to jeevan saarthak ho jaaye.
    sundar rachna
    badhayi
    aabhaar

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  11. बहुत दिनों से हम भी गायब थे ब्लॉग जगत से.... आज देखा तो आप भी गायब हो..... सब खैरियत है ना.....वसंतपंचमी की शुभकामनाएँ सहित !

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  12. इस जानदार और शानदार प्रस्तुति हेतु आभार।
    =====================
    कृपया पर्यावरण संबंधी इन दोहों का रसास्वादन कीजिए।
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    गाँव-गाँव घर-घ्रर मिलें, दो ही प्रमुख हकीम।
    आँगन मिस तुलसी मिलें, बाहर मिस्टर नीम॥
    -------+------+---------+--------+--------+-----
    शहरीपन ज्यों-ज्यों बढ़ा, हुआ वनों का अंत।
    गमलों में बैठा मिला, सिकुड़ा हुआ बसंत॥
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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  13. yaad karne ke liye sabko shukriya... vapas aa gaya hoon... jaldi mulakat hogi...

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