शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

तुझे अश्यार अच्छे लगते थे ना।
आके देख , आज गजलों की किताब हो गया हूँ।

तू उलझती थी उन् दिनों मुझे समझने में।
आके देख एक आसान सा हिसाब हो गया हूँ।

तेरे हर सवाल पे मैं रहा हमेशा खामोश।
आके देख तेरे हर सवाल का जवाब हो गया हूँ।

मुझ ज़रे को तुने ही फूंका था।
आके देख जलते जलते आफताब हो गया हूँ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. मुझ ज़रे को तुने ही फूंका था।
    आके देख जलते जलते आफताब हो गया हूँ

    क्या गज़ब लिखा है. बहुत खूब.

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  2. पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिपण्णी देने के लिए!
    बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

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