शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

कहो आनंद

कहो कहाँ घुमने गए थे आनंद ।
कौन सी मंजिल चूमने गए थे आनंद।

डूबे हैं तुम्हारी थाह में कितने।
तुम कौन से सागर में डूबने गए थे आनंद।

आज में बैठे बैठे कल और परसों ।
क्या उसके दर भी घुमने गए थे आनंद।

दिन का उजाला भर के अँधेरी रात में
कौन सा ख्वाब ढूंढने गए थे आनंद।

1 टिप्पणी:

  1. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है .

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